Friday, October 7, 2011

गधावृत्ति

गधा
बहुतों का
बाप बन जाता है
जब वो
कुर्सी पर
चढ जाता है
कुर्सी बनाती है
उसे समझदार
और हमें गधा
पूछते रह जाते हैं हम
देव। मेरे भाग्य में है क्या बदा...
गधा इस युग में कहीं भी
कभी भी
कुर्सी पा जाता है
और उससे ज़्यादा अक्लमंद
खच्चर को ठेले में
और घोड़े को ताँगे में
जोता जाता है
कुर्सी पर बैठा गधा
सर्वज्ञ कहलाता है
बिना कुछ पढे
बिना कुछ लिखे
कभी पीएचडी
तो कभी डी. लिट् कर जाता है
फिर उसका ढेंचू ढेंचू चिल्लाना
गीत बन जाता है
और वो बन गायक
बाज़ार पर छा जाता है
गधा सीख गया है
घड़ियाली आँसू बहाना
झूठ का साथ देना
सच छिपाना
लोकिन नहीँ भूला अब भी
चारा खाना
दुलत्ती चलाना
लेकिन जब जब गधा
लात चलाता है
तो उसके खुर का निशान
हम जैसों की पीठ पर आता है...
एक बात
जो गधे और उसके जैसे
और गधों में खास है
वो ये
कि उसे अपने गधे होने का अहसास है
इसलिए
जब उसके चारों और
सच का हॉर्न बजाती भीड़ हो
तो वो चुप रहता है
मूर्तिवत्
किसी से कुछ नही कहता
लेकिन इस भीड़ के जाते ही
चिल्लाता है
और अपनी ढेंचू ढेँचू सबको
ऊंचे सुर में सुनाता है
दरअसल
चार टांगों वाली कुर्सी की
चौपाए गधे से यारी है
और इन दोनो का मेल आज तक
पूरी दुनिया पर भारी है
लेकिन
ये सब
ना गधे की
और ना कुर्सी की माया है
कसूर उस समझदार गधावृत्ति का है
जिसने उसे
सुनकर, गुनकर, झेलकर
और फिर चुनकर
कुर्सी पर बैठाया है......


"गगन"

2 comments:

  1. kya baat... kya baat... kya baat..

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  2. अंतत: इस कविता ने वर्चुअल स्‍पेस में दस्‍तक दे ही दी. आपको धन्‍यवाद एवं शुभकामनाएं आपके निरंतर लेखन के लिए.

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