सत्य ही सियासत हैं
सत्य नहीं सियासत है
असत्य में महारत है
महारत में जो माहिर है
जो माहिर है वह ज़ाहिर है
ज़ाहिर है जो हाज़िर है
हाज़िर की तो हुज्जत है
ग़ैर की तलाश है
ये ग़ैर आखिर कौन है
जो देखकर सब मौन है
क्या मौन ही स्वीकृति है?
जन-जन की क्या नियति है
नियति नियंता चुप क्यों है
अंधकार ये घुप्प क्यों है
काली पट्टी क्यों ना खोलता
कानून क्यों नहीं बोलता
अंधेरे में जलती चिता है
इक बेटी है इक पिता है
खेतों में जलती लाश है
हर राख में दबी आग है
इस आग का ही सेक है
कहीं दूर किसान एक है
किसानों को इक शंका है
हाकिम ने बजाया डंका है
डंके पे किसकी चोट है
उसे कहते कॉर्पोरेट है
ये साहूकार मॉडरेट है
साहूकार संग सरकार है
सरकार क्यों तैयार है
तैयारी है बड़ी लूट की
साहूकार को ही छूट की
छूट का ही है ये डर
किसान फिरता दर बदर
कहीं छूट गए ग़र खेत तो
कैसे होगा गुजर बसर
गुजरा हुआ जो कल गया
सीख दे वो पल गया
पलते जो परजीवी से हैं
लगते बुद्धिजीवी से हैं
बुद्धि से उनकी लड़ाई है
ना की बुद्ध की पढ़ाई है
जो पढ़ा उसको भूल गए
लगता नहीं कि स्कूल गए
स्कूलों में पढ़ाया था सबक
जो था भी और रहेगा भी
राज चिह्न ये कहेगा भी
कि सत्य की ही जीत है
असत्य से जिनकी प्रीत है
सत्य से कहीं दूर हैं
जो सत्ता के मद में चूर हैं
खुद पे इतना गुरूर है
मग़रूर कितना शासक है
लोकतंत्र में ये घातक है
होता फिर भीतरघात है
ये समझा नहीं कुछ बात है
बातें बस मन की करता है
जन वेदना नहीं सुनता है
इसे लगता है ये राजा है
सिस्टम का बजता बाजा है
बाजे में जय-जयकार है
चाटुकारिता का बाज़ार है
बाज़ार में सच ना बिकता है
यहाँ झूठ जमकर टिकता है
क्योंकि झूठ की भरमार है
असत्य की सरकार है
सरकार की सियासत है
उसे असत्य में महारत है
सिर्फ चेहरे बदलते हैं
असत्य की राह चलते हैं
फिर उन्हें लोग चुनते हैं
क्यूँ उन्हें लोग चुनते हैं
गगन
जब इस तरह के शब्द ज़ेहन से उतरतेहैं तो मौन की चुप्पी भरी स्वीकृति भी अदम्य शक्ति में बदल सकती है..... और इंक़लाब का रास्ता और प्रखर होता प्रतीत होता है.....
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